प्रेग्नेंसी की शुरुआत से डिलीवरी तक कौन-कौन सी जांच जरूरी? जानें पूरा शेड्यूल
गर्भावस्था हर महिला के जीवन का अत्यंत सुखद एवं संवेदनशील चरण होता है, जहाँ थोड़ी सी असावधानी भी जच्चा-बच्चा दोनों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। प्रायः देखने में आता है कि महिलाएं गर्भावस्था की पुष्टि होने के उपरांत डॉक्टरी सलाह तो लेती हैं, किंतु समय पर आवश्यक पैथोलॉजिकल टेस्ट और अल्ट्रासाउंड कराने में लापरवाही बरतती हैं। इससे संभावित जोखिमों का समय पर पता लगाने में अड़चन आती है। प्रत्येक तिमाही में कराई जाने वाली जांचें शिशु के शारीरिक विकास और माता की स्वास्थ्य स्थिति का सटीक आकलन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रथम तिमाही (पहले से तीसरे महीने तक) में आवश्यक परीक्षण
गर्भावस्था के शुरुआती चरण में लगभग छठे से आठवें सप्ताह के दौरान पहला अल्ट्रासाउंड किया जाता है, जिससे गर्भस्थ शिशु की धड़कन और भ्रूण की सटीक स्थिति का पता चलता है। तत्पश्चात 11वें से 13वें सप्ताह के मध्य एनटी स्कैन तथा डबल मार्कर टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है। ये जांचें शिशु में डाउन सिंड्रोम जैसी किसी भी गुणसूत्र (क्रोमोसोमल) संबंधी असामान्यता के खतरे को पहले से पहचानने में सहायक होती हैं।
द्वितीय तिमाही (चौथे से छठे महीने तक) में स्वास्थ्य मूल्यांकन
गर्भावस्था के मध्य चरण यानी 18वें से 20वें सप्ताह में 'एनोमली स्कैन' (लेवल-2 अल्ट्रासाउंड) कराना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके माध्यम से शिशु के मस्तिष्क, हृदय, गुर्दे तथा हड्डियों की बनावट एवं अंगों के विकास का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया जाता है। इसके अलावा 24वें से 28वें सप्ताह में जेस्टेशनल डायबिटीज की जांच हेतु 'ओजीटीटी' (ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट) तथा हीमोग्लोबिन स्तर की जांच कराई जाती है, ताकि एनीमिया का समय रहते उपचार हो सके।
तृतीय तिमाही (सातवें से नौवें महीने तक) में प्रसव पूर्व निगरानी
अंतिम चरण में 28वें से 32वें सप्ताह के दौरान 'ग्रोथ स्कैन' के जरिए गर्भस्थ शिशु के वजन, शारीरिक वृद्धि और एम्नियोटिक द्रव (गर्भ में पानी) की मात्रा का जायजा लिया जाता है। आवश्यकतानुसार 32वें से 36वें सप्ताह के बीच डॉप्लर स्कैन द्वारा गर्भनाल व शिशु तक रक्त प्रवाह का अध्ययन किया जाता है। प्रसव से ठीक पहले के दिनों में नियमित रूप से रक्तचाप, वजन और एनएसटी (नॉन-स्ट्रेस टेस्ट) जैसी जांचें जच्चा-बच्चा की सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं।
जांच कराने के दौरान ध्यान रखने योग्य सावधानियां
चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान सही परिणाम प्राप्त करने के लिए कुछ दिशानिर्देशों का पालन आवश्यक है। बिना डॉक्टरी परामर्श के खाली पेट जांच केंद्र न जाएं; ओजीटीटी जैसे टेस्ट को छोड़कर अधिकांश अल्ट्रासाउंड से पूर्व हल्का भोजन लिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, अपनी सभी पुरानी मेडिकल रिपोर्ट व पर्चे हमेशा साथ रखें और किसी अन्य महिला की रिपोर्ट से तुलना करने या इंटरनेट पर आधारित स्व-चिकित्सा से पूरी तरह बचें। डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही नियत समय पर हर टेस्ट कराना सुरक्षित प्रसव की कुंजी है।

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