भारतीय महिला मुक्केबाजी की दिग्गज खिलाड़ी लवलीना बोरगोहेन जब चीन की बाओ जियायी के खिलाफ खिताबी मुकाबले के लिए रिंग में उतरीं, तो उनके सामने अपने 29वें जन्मदिन के अवसर पर खुद को एक ऐतिहासिक स्वर्ण पदक का तोहफा देने का सुनहरा मौका था। भारत की इस स्टार मुक्केबाज ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल मुकाबले में अपने प्रतिद्वंद्वी को 5-0 के सर्वसम्मति वाले एकतरफा स्कोर से करारी शिकस्त दी। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही वह महान मुक्केबाज मैरीकॉम के बाद एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली देश की दूसरी महिला मुक्केबाज बन गई हैं।

बर्थडे गिफ्ट के रूप में स्वर्ण पदक जीतने का संकल्प

मुकाबले के बाद स्वर्ण पदक अपने गले में पहनने पर अपनी इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लवलीना ने इसे अपने जन्मदिन का सबसे बेहतरीन तोहफा करार दिया। उन्होंने कहा, मुझे बेहद अच्छा महसूस हो रहा है। मैंने पहले ही सोच लिया था कि इस बार अपने जन्मदिन पर मुझे खुद को एक स्वर्ण पदक गिफ्ट करना है। मैच के दौरान हारने के बारे में एक सेकंड के लिए भी मेरे मन में कोई विचार नहीं आया था। यह बेशक एक कड़ा मुकाबला था, लेकिन मेरा पूरा फोकस सिर्फ इस बात पर था कि मुझे हर हाल में जीत हासिल करनी है।

राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता और मानसिक मजबूती

भारतीय मुक्केबाज लवलीना ने इससे पहले राष्ट्रमंडल खेलों में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक अपने नाम किया था, हालाँकि फाइनल मैच में हार मिलने के कारण स्वर्ण पदक उनके हाथ से मामूली अंतर से फिसल गया था। इसके बावजूद उन्होंने स्वीकार किया कि वह सफलता उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। उन्होंने कहा, ऐसा बिल्कुल नहीं था कि राष्ट्रमंडल खेलों के बाद मैं निराश थी। मैं रजत पदक जीतकर भी उतनी ही खुश थी। एक पेशेवर खिलाड़ी के जीवन में उतार-चढ़ाव, हार और कई तरह की चोटें आती रहती हैं, जिन्हें संभालते हुए हमें हमेशा आगे बढ़ना होता है। यह स्वर्ण पदक मेरे लिए बहुत मायने रखता है।

मुकाबले की रणनीति और कड़ा संघर्ष

मैच की शुरुआत में पहले दौर में 3-2 की करीबी बढ़त बनाने के बाद लवलीना ने मुकाबले में अपना पूर्ण दबदबा कायम रखा। एशियाई खेलों में अपना दूसरा पदक हासिल करने के लिए उन्होंने अगले दोनों दौर 4-1 के समान अंतर से अपने नाम किए। खिताबी मुकाबले के आखिरी दौर के अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वह जानती थीं कि अंत में सतर्क रहना जरूरी है। उन्होंने कहा, हाँ, आखिरी दौर वाकई बहुत कठिन था क्योंकि मेरी प्रतिद्वंद्वी बहुत मजबूत थीं। मैं उनके साथ पहली बार रिंग में खेल रही थी, इसलिए मुझे उनके खेलने के तरीके का कोई पूर्व अंदाजा नहीं था। मैं लगातार खुद को प्रेरित कर रही थी कि मुझे किसी भी कीमत पर जीतना है। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं हार नहीं मानना चाहती थी।

उन्होंने आगे कहा, मैं सिर्फ और सिर्फ स्वर्ण पदक जीतने के इरादे से ही एशियाई खेलों में उतरी थी। मैंने खुद को मानसिक रूप से मजबूत रखा और हर परिस्थिति को लेकर बेहद सकारात्मक बनी रही। मेरा जन्मदिन था और मैंने मुकाबले में जीत हासिल कर ली। यह सफर कठिन जरूर था, लेकिन मैंने दमदार तरीके से इसे अंजाम दिया।

भारतीय महिला मुक्केबाजी के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि

भारतीय महिला मुक्केबाजी के इतिहास में यह एक अत्यंत स्वर्णिम और ऐतिहासिक क्षण है, क्योंकि वर्ष 2014 के इंचियोन खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली दिग्गज मैरीकॉम के साथ अब इस विशिष्ट फेहरिस्त में लवलीना बोरगोहेन का नाम भी जुड़ गया है। अपनी इस बड़ी जीत पर खुशी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक सफलता की गहराई को पूरी तरह महसूस करने और स्वीकार करने में उन्हें अभी थोड़ा समय लगेगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, मुझे बेहद आनंद आ रहा है। फिलहाल मुझे यह भी नहीं सूझ रहा है कि इस गोल्ड मेडल का जश्न कैसे मनाऊँ। मुकाबला अभी-अभी समाप्त हुआ है, इसलिए इस पल को आत्मसात करने में मुझे थोड़ा वक्त चाहिए।